पूर्णता का मंत्र

समिष्टि का संकीर्तन मैं मीना शरीर में पूर्ण हूँ प्रणव हूँ प्रत्यक्ष हूँ प्रमाण हूँ वेद हूँ विज्ञान हूँ वेद विज्ञान मिलन हूँ मैं मीना शरीर में युगचेतना हूँ, समिष्टि का संकीर्तन हूँ समय की किताब पर श्रीकृष्ण का हस्ताक्षर हूँ, मैं वही तो हूँ यही सत्य है यहीं सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

कौन बाँधेगा मुझे

मैं मीना प्रकृति की पुत्री प्रकृति की ही अनुकृति न बँधी थी न बँध रही हूँ न बँध के रहूँगी मैं खुशबू का झोंका मस्त पवन की बहार बहती नदी का बहाव एक लहर किनारे तक पहुँच ही दम ले समुद्र में समा फिर बादल बन चल दे कौन बाँधेगा मुझे प्रकृति की चाल को शायद कोई हिमालयी चट्टान जैसे व्यक्तित्व वाला निर्बाध अनन्य निश्छल प्रेम पगा कृष्ण चेतना वाला जो मुझे बाँधकर घेरकर साफ पानी की झील बना दे जो सदा नीलमणि-सी चमके आँख के तारे-सी दमके आँख के तारे-सी दमके सबको प्रकृति के स्वरूप का कराए अमृतपान देकर मानव को अनन्त प्रेम धाराओं का दान जो बाँधेगा बहती मीना को वही देगा मानसरोवर धरा को एक पावन पुण्य देवभूमि जैसे स्वर्ग धरा पर जन्नत जमीं पर मीना के मन वाली होगा कोई अनन्य जो जानेगा मीना का मन धरूँ ध्यान बाँटू ज्ञान करूँ दूर पूर्ण अज्ञान वेदों का…

मूलरूप

तू खुशबू है तुझे कैसे गिरफ्तार करूँ मैं जो जल गया मैं जो मिट गया मैं जो मिट गया जल गया गल गया बह गया उड़ गया मिल गया अग्नि अग्नि में पानी पानी में आकाश आकाश में हवा हवा में पृथ्वी पृथ्वी में समा गया और बन गया तेरा ही मूलरूप जिसमें मिला दो लगूँ उस जैसी यही है उसका रंग मैं तो यही जानूँ हूँ बस अब वो ही वो है, वो ही वो है वो ही वो तो है मैं कहीं नहीं, मैं तो कहीं नहीं, कहीं नहीं कहीं भी नहीं यही सत्य है यहीं सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

सुरीली

बजी बांसुरी कृष्ण की शान्ति के बिगुल सी मीना के मन सी सत्य के कथन सी प्रेम के सपन सी राधा के प्राण सी कर्म के आयाम सी जागरण के आह्वान सी जीवन के नव-विहान सी वेद के विधान सी कृष्ण के अनुप्राण सी मीना न सोई सी न जागी सी ब्रह्माण्ड की आँख की पुतली सी मनभाई सी मन ही मन मुस्काई सी दुर्गा सी ब्रह्मवादिनी मीना स्वयं साधिनी मीना मनु यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ

एक ही बात

तेरा मेरा एक ही प्राण प्रभो तुम ही तो भेजते हो जगह-जगह क्यों कृष्ण क्यों जगह-जगह फिराए तुम्हारा विरह जो जो भी काम कराने हैं जिन जिनके कर्म धुलवाने हैं खुलवाने हैं तुमने मेरे कदम वहीं तो पहुँचाने हैं क्यों चुना मुझे ही कृष्ण? यही तो बात है मीना के मुस्कराने की अन्तर में दर्द छुपाने की दिल में अथाह विरह ऊपर मनोहारी मुस्कान करे तेरा गुणगान ना देना अभिमान मेरा तेरा तो एक ही है प्राण कहाँ-कहाँ घुमाए तेरा विरह अपने ही कर्म कराने को बड़े चतुर हो प्रभो पर मीना जाने तुम्हारी चतुराई सकल सृष्टि में क्रिया समाई काठमांडू भेजा राज परिवार का कल्याण हुआ गुजरात भेजा भूकंप ला दिया न्याय विधान स्थापित किया और भी बहुत कुछ कराते रहते हो कन्हाई झूला धीरे-धीरे झुलाया करो ओ सांवरे कन्हाई यही तो है खुदाई तुम्हारी सब जानो हो ओ मुरारी ओ मुरारी यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम…

ज्ञानमयी

रुकना कब जाने मीना आगे ही आगे बढ़ना ही होगा रुकना कब जाने मीना तुमको कदर नहीं तुमको खबर नहीं तुमको सबर नहीं तो ये चली मीना, बही मीना सही मीना कब कहाँ रही मीना न यहाँ रही न वहाँ रही पारे की तरह पारदर्शी मीना फिर भी न जाने मीना हैरान है मीना क्यों न समझ पाए ज़माना कि क्या है मीना? वेदमयी सत्यमयी प्रेममयी मीना कर्म दीवानी मीना प्रभु की कहानी मीना यही सत्य है !! यहीं सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

मेरा वादा

तेरे नजदीक आकर तुझसे मिलकर ही तुझे देख लिया अब सबको दिखाना है बताना है सुनाना है यही मेरा वादा है यही मेरा वादा है तुझसे ओ हमनवा ओ मेरे हमनवा मेरे मन मेरे कृष्ण स्नेहा लाग्यो मोरो श्यामसुन्दर सों, स्नेहा लाग्यो स्नेहा लाग्यो मोरा श्यामसुन्दर सों श्यामसुन्दर सों यही सत्य है !! यहीं सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

खुदा जाने

क्या किसी को भी प्यार करने से प्यार हो जाता है क्या किसी को भी प्यार करने से प्यार हो जाता है नहीं तो… फिर प्यार कैसे हो जाता है खुदा जाने खुदा जाने यही सत्य है यहीं सत्य है

प्रीत पुरानी

बीति ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेइ मुक्की फसलाँ दी राखी ते आई बैसाखी मुझे भी आज ऐसा ही लग रहा है जैसे नया मन नया तन नए दिन नयी रात जो बीत गया उसकी अब करूँ क्या बात जि़न्दगी की यही सौगात जो न चल सके साथ थामकर मेरा हाथ प्रेम का क्या होता है स्वाद जान न पाएगी उनकी जात पर अब मन न उदास हो जैसे कोई आसपास हो प्रभु मिलन की आस हो बाकी एक ही प्यास हो कृष्ण गोविन्द हरि का ही प्राणों में वास हो सारा जग सुवास ही सुवास हो मन ही मन प्रकाश हो मोहन की मनमानी मीना की कहानी जिसने जानी उसने मानी प्रभु की वाणी गीता सुहानी यही मीना की प्रीत पुरानी प्रीत पुरानी सदियों पुरानी सृष्टि ने जानी मुनियों ने बखानी कैसे जाने प्राणी प्रीत पुरानी रीत पुरानी प्रेम कहानी जो सकल ब्रह्माण्ड समानी कण-कण कहे यही कहानी…

शरारतें

कर्म व प्रेम-लीला की क्यों कभी-कभी बहुत शरारतें हो जाती हैं शायद यही है कृष्ण-लीला जानती हूँ कभी-कभी कर्म बनाने ही पड़ते हैं बनाने ही पड़ते हैं बहुत ज़रूरी हैं वरना कैसे टिकूँगी धरती पर तेरा कर्म करने को? कुछ कर्म बनाती हूँ जानबूझ कर तुम्हीं तो बनवाते हो कर्म क्योंकि कर्मों का हिसाब-किताब तो इसी धरती पर पूरा करना होता है कर्मों की गुत्थी खोलने को धरती चाहिए यह संसार चाहिए तो तुम मुझसे कर्म करा ही लेते हो इस बहाने धरती पर रहूँगी धरती पर रहूँगी और जानते हो कि कर्म तो तुम्हारा ही करना होगा इसके अलावा मेरा और कोई कर्म है ही नहीं नहीं है न, बिल्कुल खाली हूँ थोड़ा कर्म बनाया हाथ के हाथ वह भी औरों के कुछ कर्म धुलवाने को धुलवाने को धोने को भुगतवाने को हो जाऊँ फिर हल्की-हल्की महकी महकी बहकी बहकी चहकी चहकी तेरी सोन चिरैया ओ, कन्हैया बंसी बजैया…