विष्णु की विडम्बना : भाग- 2
जीवन से तप-तप कर जीना अपनों से मिल-मिल कर बिछुड़ना काम निकल जाने पर मुँह मोड़ना आराम से एक क्षण में दिल तोड़ना सब सिखा गया वैराग्य की नीति कर्म की रीति अन्तरमन के ज्ञान की भक्ति मोह माया की सत्य प्रेम प्रकाश में परिणति कोमा में सोए लोग क्यों टिके रहते हैं चिता पर जलते शव क्यों चुप रहते हैं जिसे जीवन ही चिता बन जलाए तपाए सताए वो ही तो रज तम सत सबसे परे ही परे जा पाए ऐसा ही आत्मावान मानव गुणातीत हो बोलने वाला शव विष्णु कहाए सबसे बड़े अंतिम सत्य को पाकर ही तो मानव शव होता है पर इस सबसे बड़े सत्य को पाकर जो लीला कर पाए वही… वही लीला पुरुष तो पूर्ण अवतार होता है अपनी लीलाओं से वो सबका मनोरंजन तो कर पाता है पर उसके सत्य का मौन कौन सुन पाता है हाँ सुन पाता है वही कोई अर्जुन…
