गुरु की विडम्बना
मैं मीना मूर्ख महान कंघे बेचूँ गंजों को आइने बेचूँ अंधों को ज्ञान बेचूँ अक्लमंदों को जिनकी अक्ल हो गई है मंद प्यार बाटूँ कृतघ्नों, thankless, को मान करूँ चाण्डालों का कर्म का पाठ पढ़ाऊँ कर्महीनों को दया करूँ राक्षसों पर बुलाऊँ धोखेबाजों को घर मोरी अक्ल गई घास चरने मूर्खों का पानी भरने भैंस के आगे बीन बजाऊँ गधों के आगे मुस्काऊँ कभी-कभी सोचूं गुरुओं की बाबत क्या होती है उनकी हालत शिष्य नचाएँ मंच बाँध कर गुरुजी नाचे उनकी ताल पर गुरु बन रहे मूर्ख शिष्य पूरे के पूरे धूर्त जहाँ कहा ज़रा-सा गुरुजी आप महान आशीर्वाद बाँटे गुरु भर-भर झोली ढेर-सा प्रसाद औ' मधुर-मधुर बोली शिष्य होते धन्य पाते प्रसाद आ जाएँगे फिर जब होगा विषाद आशीर्वाद ले चम्पत हो जाते अपने-अपने खेलों में रम जाते गुरु बिचारे करते रहते तैयारी पूजा की पाठ की ऊर्जा शक्ति प्राप्ति की प्रकाश प्रसार की ताकि आवें घूम-फिर कर जब…
