गुरु की विडम्बना

मैं मीना मूर्ख महान कंघे बेचूँ गंजों को आइने बेचूँ अंधों को ज्ञान बेचूँ अक्लमंदों को जिनकी अक्ल हो गई है मंद प्यार बाटूँ कृतघ्नों, thankless, को मान करूँ चाण्डालों का कर्म का पाठ पढ़ाऊँ कर्महीनों को दया करूँ राक्षसों पर बुलाऊँ धोखेबाजों को घर मोरी अक्ल गई घास चरने मूर्खों का पानी भरने भैंस के आगे बीन बजाऊँ गधों के आगे मुस्काऊँ कभी-कभी सोचूं गुरुओं की बाबत क्या होती है उनकी हालत शिष्य नचाएँ मंच बाँध कर गुरुजी नाचे उनकी ताल पर गुरु बन रहे मूर्ख शिष्य पूरे के पूरे धूर्त जहाँ कहा ज़रा-सा गुरुजी आप महान आशीर्वाद बाँटे गुरु भर-भर झोली ढेर-सा प्रसाद औ' मधुर-मधुर बोली शिष्य होते धन्य पाते प्रसाद आ जाएँगे फिर जब होगा विषाद आशीर्वाद ले चम्पत हो जाते अपने-अपने खेलों में रम जाते गुरु बिचारे करते रहते तैयारी पूजा की पाठ की ऊर्जा शक्ति प्राप्ति की प्रकाश प्रसार की ताकि आवें घूम-फिर कर जब…

समर्पण का विज्ञान

बनना होता है करुणासागर करने को प्रेम विस्तार प्राणी चतुर महान अपने से अनजान इष्ट से रुष्ट दुष्ट से खुश समर्पण की परीक्षा तक पहुँचे कोई-कोई ही महान परीक्षा जो दे पाएगा वही पाएगा आत्मज्ञान कृष्ण स्वरूप वरदान तो न रहो अनजान जानो समर्पण का विज्ञान जानो समर्पण का ज्ञान-विज्ञान… विधि का विधान मनु का प्रणाम यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ

कर्मगति न्यारी

आज का ध्यान : हे मानव ! संशयों या प्रश्न पूछने में ऊर्जा व्यय करने की अपेक्षा सामने आए कर्म को कैसे पूरे मनोयोग शान्ति व धैर्य से पूर्णतया निभाना है इसका उद्यम करना होता है। क्योंकि प्रकृति का नियम है कि कर्म ही कर्म को काटता है। कर्म बंधनों से मुक्ति का उस परम चेतना ने बहुत ही अच्छा विधान किया हुआ है। कर्मों से कैसे किन-किन कर्मों से मुक्ति होगी वही मानव के सामने आते हैं। जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा स्वत: प्राप्त युद्घ को अपना कर्म जान हे अर्जुनï! विषाद व संशय की अपेक्षा युद्ध को तत्पर हो। घटनाओं से बचना नहीं है उनसे कैसे अपनी पूरी क्षमताओं से गुजरना है इसी का पूरा प्रयत्न होना चाहिए। क्योंकि पूरी कर्मठता से किए गए कर्म से ही विवेक जागृत होता है और फलेच्छा रहित किए गए कर्म से आत्मबल जागृत होता है जो मानव के उत्थान का मार्ग…

मानवता को संदेश : अपने मूल स्वरूप में परिवर्तित होओ

मानव ने अपने अस्तित्व का एक चक्र, सरल पवित्र शुद्ध आत्मवान और वास्तविक होने से लेकर चालाक पाखंडी धूर्त हेराफेरी और बुद्धि की जोड़ तोड़ से काम निकालने वाला होने तक का, पूर्ण कर लिया है। यह अनुभूत किए बिना कि इसमें उसने मानव जीव की प्राकृतिक उत्थान प्रक्रिया को कितना मलिन कर दिया है। वो मानव जिसे प्रकाश का ज्योतिर्मय पुंज, दिव्यता परिलक्षित करने वाला होना था वो मात्र बुद्धि की चतुराइयों और समायोजनाओं का उत्पाद बनकर अज्ञान के अंधकारमय कूप में गिरा हुआ यह सत्य भी समझ नहीं पा रहा है कि किस सीमा तक उसका पतन हो गया है। इस कारण अब प्रकृति ने अपने हाथों में नियंत्रण की रास थाम ली है। इसलिए या तो अपनी बनाई हुई अनभिज्ञता की खाइयों में विनष्ट हो जाओ या स्वयं पर कर्म कर शक्ति पाकर इनसे बाहर कूद आओ। मानव इतना उलझ गया है नीरस सपाट सीधी क्षितिजीय रेखा…

आज का ध्यान

जो समाज अपने इतिहास से सबक नहीं लेता उसका भूगोल बदल जाता है, संस्कृति नष्ट हो जाती है। भविष्य अंधकारमय हो जाता है। धन्य है भारतभूमि कोई न कोई अवतारी बन पुन: शाश्वत सनातन सत्य का मार्ग प्रशस्त अवश्य ही करता रहता है। यही है इस पुण्य भूमि का प्रताप। यही सत्य है… समय अब करवट ले रहा है… अब पीछे देखने का समय नहीं है। सच्चे राष्ट्रप्रेमियों का प्रयास अनुभूत किया जा रहा है। प्रणाम इस नवीन युग, सत्य के उजागर होने के समय आ पहुंचने, का साक्षी हो रहा है। प्रणाम के मन का भारत, श्रीकृष्ण के मन का अर्जुन कर्मठ कर्मयोगी, तत्पर सत्ययोगी व सत्य स्थापित करने को संकल्पित दृढ़ निश्चयी मानव निर्भय हो अपना मानव धर्म निबाहने को कर्मरत हुआ है। पुन: प्रतिष्ठित होता भारत जगद्गरु बनने की ओर अग्रसर भारत ….जागो उठो और बढ़े चलो अभी तो बहुत संघर्ष व कर्म करना है।जय भारत !!…

जागो ओ भारत : सतस्य सत्यम-सत्य का सच

सत्य ही निर्लेप और निर्मल है, सर्वव्यापक है, सर्वशक्तिमान है। अब सत्य मानवों को एकजुट होना ही होगा। भारतीय जनमानस को, भारत के गौरव को पुनर्जीवित करने और सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे आना होगा। भारत सनातन शक्ति द्वारा संसार को सत्य मार्ग दिखाने की क्षमता रखता है। एक पूर्णतया सत्यमय मानव की आत्मशक्ति ही बहुत है रूपांतरण की धारा बहाने को सत्यमेव जयते की प्रमाणिकता सिद्घ करने को। प्रणाम साहित्य की शब्द संयोजनाएं केवल साहित्यिक रचनाएं ही नहीं वरन् क्षण-क्षण का प्रमाण हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, प्रेम व कर्म के संतुलित समन्वय की अभिव्यंजना है, यही इस युग के उत्थान का सही मार्ग है। कर्म की बेला प्रारम्भ हो चुकी है। अब समय आ गया है कि मानव यह सत्य समझे। कैसे हो जाता है मानव ही सम्भवामि युगे-युगे, सत्यम् शिवम् सुंदरम्। यही प्रणाम साहित्य का सत्य, सत्यात्मा का सत्य है। प्रणाम मीना ऊँ

चतुर्मास का महत्व

देवशयनी एकादशी को विष्णु अपनी शेषशैय्या पर शयन के लिए गमन कर गए। चौमासा लग गया श्री विष्णु जगत के नियंता, पालनहार सो गए और वो भी चार मास के लिए… क्या सच में संसार के स्वामी चार महीनों के लिए सो जाते हैं? तो ब्रह्माण्ड की व्यवस्था कैसे चलेगी? इसको ऐसे समझें कि यदि देश के प्रधानमंत्री कुछ समय के लिए विदेश चले जाते हैं तो देश की व्यवस्था ठप हो जाती है क्या… किसी कंपनी का अध्यक्ष एक महीने की छुट्टी पर चला जाए तो क्या कंपनी चलती नहीं… कोई ना कोई तो सत्ता सम्भालता ही है विशेषकर जिसको कर्म सौंपा जाए। तो जगत के स्वामी भी यह अधिकार किसी ना किसी को देकर ही शयन करने जाते हैं। जगदीश्वर के निद्रागमन करते ही गुरु शक्ति जागृत हो जाती है। गुरुपूर्णिमा उत्सव विश्वास दिलाता है कि सबका ध्यान रखना है और सबको सन्मार्ग पर चलाना है इस कर्म…

प्रभु का दीया

मैं आत्मा हूँ आत्मा ही तो हूँ आत्मा में पूर्णतया सन्तुष्ट आत्मा के गुणों में रमने वाली आत्मा से ही खेलने वाली बातें करने वाली औरों की भी आत्मा से ही सम्पर्क साधने वाली उसी को अनुभव कर उसी अनुभूति पर मग्न रहने वाली आत्मा के ही गुण विस्तीर्ण करने को यह शरीर प्रभु का दिया हुआ प्रभु का ही च्दीयाज् यही सत्य है यहीं सत्य है प्रणाम मीना ऊँ

दिव्य रागिनी

तुम आए मुझे देखा और जीत लिया मैंने पाया वरदान-सा प्यार तुम्हारा फूटा जो नटखट झरने जैसा मन की गहराइयों से उदारता से भिगो गया धड़कते दिल की सभी तहें भर गई मैं चमकीली फुहारों से उस परम प्रेम के आनन्द से डूब गई पूरी की पूरी मेरी आत्मा एक एकाकी शान्त स्थाई भाव में अन्तर में सुलगे जब ज्वालामुखी कामनाओं की तो उबरूँ सन्तुष्टï चहकती-सी आनन्दित होती हुई तुम आए… मुझे देखा और जीत लिया मैंने पाया वरदान-सा प्यार तुम्हारा बहुत ही सुन्दर है यह प्यार कितना सुन्दर है यह प्यार? जो सहला दे सुलझा दे सारी सलवटें सारी उलझनें बुझे-बुझे से जीवन की सहमे-सहमे से भावों की सिमटी-सिमटी सी संकुचित भावनाओं की मेरी खुशी की ओढ़नी पर सितारे टाँकती-सी तुम आए… मुझे देखा और जीत लिया मैंने पाया वरदान-सा प्यार तुम्हारा जितना भी तुम ले लेते हो उससे भी अधिक पा लेती हूँ तुम देते हो प्रतिदिन पूरी…