मैं मानस पुत्री प्रकृति की

मैं प्रकृति ही हूँ संत नहीं जो तांडव न करूँप्रत्येक अपूर्णता को नकारना ही धर्म है मेरापूर्णता को स्वीकारना पे्रम है मेरापूर्णता की ओर ले जाना कर्म है मेरा यही सत्य है मीना नामधारी जीव कुछ नहीं है कोई नहीं है समय की उत्पत्ति हूँ ...ऊँ संभवामि युगे युगे हूँ ऊँ प्रकृति की मानस पुत्री हूँ ...ऊँ जैसे वो है वैसी ही हूँ ...ऊँमीना ऊँजो वो करती है वही करती हूँ ...ऊँयही सत्य है !!

ज्ञान ध्यान

कोई भी किसी को रास्ता नहीं बता सकता। कोई भी किसी को सही रास्ते पर नहीं चला सकता। हाँ, रास्ता बता सकता है और रास्ते भी कई हैं। सैकड़ों ज्ञानी ध्यानी अवतारी बता गए। क्या दुनिया में दुख-दर्द दूर हो गए। प्रणाम का माना मार्ग सत्य जानने वाला ही सत्य समझ पाता है पूर्ण सत्यमति सत्यगति सद्गति की मति और अनुभूति की पूर्णता का कालजयी युगचेतना द्वारा मान्य मार्ग माना मार्ग जो सनातन है शाश्वत है यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

पर एक द्वार

दस द्वार मानव शरीर के जो नजर आते हैं कुंजी के - जिनकी व्याख्या बहुत - आकार के - है शास्त्रों में सब जानते हैं - पर एक द्वार जहाँ से दिव्यता आती है, शरीर में समाती है और तन-मन-मस्तिष्क इस सम्पूर्ण शरीर को माध्यम बना अपनी दिव्यता से मानवता को उत्थान का रास्ता दिखाती है वह द्वार कभी नहीं बखाना गया। इसी द्वार से ब्रह्माण्ड से नाता जुड़ता है। ब्रह्माण्ड स्वयं पढ़ाते हैं ज्ञान देते हैं और इसी द्वार से प्रवेश कराते हैं वह सब अलौकिक विचार जो सृष्टि के, मानवता के व मानव के उत्थान में सहायक होते हैं मानव को दिव्यता की ओर ले जाकर अंत में दिव्य रूप बनाते हैं। पहले हुए अवतारों ने दिव्य पुरुषों ने जहाँ तक मानव उत्थान का कर्म लाकर छोड़ा वहीं से उत्थान कर्म आगे बढ़ता है क्योंकि इसी द्वार से उनके विचार सत् चित वाले शरीर को माध्यम बनाकर सृष्टि…

सेवा-दया

उस पर व्यय करो जो सुपात्र हो ! अब सुपात्र कौन है यही जानना-समझना ही ज्ञान है सही मानव उन्नत मानव आपको सामने वालों को स्वत: ही अपने समकक्ष कर लेता है। यही सत्संग माहात्म है। कौन गुरु कौन शिष्य सब छलावा है एकतरफा रास्ता नहीं। कौन लेता है कौन देता है सब माध्यम हैं। अपनी-अपनी सीढ़ी पर खड़े ब्रह्मïज्ञानी को ब्रह्मज्ञानी स्वत: ही पहचान लेता है। तुम जिस सीढ़ी पर पहुँच गए हो जहाँ खड़े हो वहीं से आगे ले जाने वाला गुरु स्वत: ही मिलता जाता हैवो गुरु किसी भी रूप में हो सकता है। यही सत्य है प्रणाम मीना ऊँ

इंसानियत

धर्म तो एक ही है इंसानियतपूर्णता लाती है - आनन्दअपूर्णता लाती है - तपस्या, तपदोनों का ही काम है सात ग्रहों, सात चक्रों की सातों ऊर्जाओं के संतुलन से ही पूर्ण शारीरिक मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की प्राप्ति हो पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। कृतित्व पूर्णता व अपूर्णता का विनाश विवेक से ही उत्थान का मार्ग है। कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं केवल पूर्णता और अपूर्णता है। पूर्णता से परमानन्द की प्राप्ति होती है अपूर्णता से कठिनाइयाँ मिलती हैं तपस्या के रूप में पूरे जीवन का निष्कर्ष यही है। सत तप यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

तत्व ज्ञान

जीवन के ज्ञान से अनभिज्ञ होना भी अज्ञान है। अपने आपको ज्ञानी समझने वाला जानने वाला सबसे बड़ा अज्ञानी हो जाता है। ज्ञान को विज्ञान से जानने वाला ही वेद होता है। उसे जीने वाला संवेद होता है। संवेद से पूर्ण संवेदनाओं का मर्मज्ञ होता है। प्रकृति की संवेदनशीलता से जुड़कर प्रकृति रूप हो जीवन्त होता है। यही है तत्व ज्ञान। यही है जीवन का सरलतम और गहनतम रहस्य। सत्य सरलतम है यदि स्वयं सत्य होने का पुरुषार्थ करने का दृढ़निश्चय कर लिया जाए। इससे स्वत: ही सारे रहस्य उजागर हो जाते हैं। जैसे श्रीकृष्ण ने गीता में कहा - मेरे पास आओ। मैं पूर्ण हूँ प्रणाम मीना ऊँ

स्वर्गादपि गरीयसी

प्रत्येक युग का सूत्राधार इसी पावन भूमि से हुआ हुआ था और होगा ही यही सत्य है मानवता मानव ही सत्य है मैं सत्य की विनम्र अन्वेषी हूँ मानवता की अदना-सी सेवक मैं जानती हूँ सत्य क्या है मैं सत्य हूँ सत्य मेरे साथ है सत्य मैं हूँ सत्य ही मैं हूँ मैं गीता हूँ गीता ही मैं हूँ जागो लोगों! जगत की बीती काली रात। मंगलमय नववर्ष का आया नवल प्रभात॥ गीता मय हूँ ओऽम् ओ परम मुझे अपूर्णता, अज्ञान अंधकार तिरोहित करने के लिए अपनी सारी शक्तियाँ एवं निर्देशन दो। एक सुन्दर संसार का उदय है काल चक्र घूम गया है ब्रह्माण्डीय रूपांतरण सत्यम् शिवम् सुन्दरम् पूरा है विश्वास पूरा होगा मेरा विश्वास मुझे माध्यम बना पूरी शक्ति ब्रह्माण्ड अवश्य देंगे अपने कर्म हेतु यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

अर्पण

रे मानव! कुछ भी रचनात्मक कर आत्मतुष्टि के लिए व्यापारिक दृष्टिकोण से कुछ रचा गया पूजा नहीं है कुछ भी करो संगीत कला मूर्तिकला चित्रकला सब नित्य नया सौन्दर्यमय कुछ कर और अर्पण कर उस परम को श्रीकृष्ण सम्पूर्ण पुरुष कहाए जगत गुरु कहाए 16 कला सम्पूर्ण हुए कुछ कर ना, रचना शुरू तो कर रे मानव! प्रभु को अर्पण कर अपनी कृति को नित्य उत्कृष्टïता की ओर ले जा। अपना आलोचक स्वयं बन। जरा-सा कुछ करके प्रशंसा का मुँह न तक। जो कुछ कर प्रभु को अर्पण कर! तेरे सब पापों का तर्पण हो जाएगा। प्रणाम मीना ऊँ

मानव मन

आप ही अक्षर ब्रह्म आप ही तत्व बीज आप ही अविनाशी आप ही विनाशी आप ही बुद्धि आप ही कुबुद्धि आप ही शैतान आप ही भगवान मानव बुद्धि सुर में तो भगवान सुर में नहीं तो शैतान यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ

शैतान

मानव ही मानव का सबसे बड़ा साथी भी दुश्मन भी देव भी असुर भी शिवजी के गण प्रतीकात्मकता शिव- पुरुष के चारों ओर रहने वाले गण मानस मानव ही भिन्न रूपों में देवता पुरुष भी राक्षस जैसे वीभत्स रूप भी गले में मुंडमाला राख सींग दांत सब भयानक सब प्रतीक मानव के हृदय की कलुषता भयावह उद्वेगों के प्रतीक!! असुर और देव गुण अवगुण और सभी विपरीत सृष्टि के आरम्भ से थे सदा हैं और रहेंगे धर्म है इनका संतुलन इनका संतुलित उपयोग दिव्यता-दैवीय गुण असुरता-आसुरी दुर्गुण गुण में भी अपूर्णता देख दुर्गुण में भी पूर्णता देख समझ लेना ही ज्ञान है दोनों ही शक्तियाँ हैं ब्रह्माण्ड विपरीत शक्तियों का पुंज है मानव छोटा सा ब्रह्माण्ड ही है संतुलन कर ब्रह्माण्ड की तरह लयात्मकता लयात्मकता ला रे मानव ! यही सत्य है !! प्रणाम मीना ऊँ