तुम जानो हो कृष्ण

तुम जानो हो कृष्ण

ओ मेरे कृष्ण खुश हो ना अब तो तुम
अब तो मुझे कभी भी
छोड़कर नहीं जाओगे न
तुम जा ही नहीं सकते
इतनी तपस्या इतनी परीक्षाएँ ले लीं
यही चाहते थे न तुम
कि तुम्हारे ही धर्म
सत्य प्रेम और कर्म पर
टिकी रहूँ
तुम ही हो जाऊँ
कोई भी ऐसा पहलू जि़न्दगी का
जिसे मैं छू न सकूँ
कोई भी वातावरण जिसे मैं
झेल न पाऊँ
तुमने छोड़ा ही नहीं
जानती हूँ

ये सब तुमने ही मुझे भुगतवाया
सब भुगतवाया सब कुछ करवाया
तुम ही सारथी बन सब जगह ले गये
फिराया घुमाया
सारा का सारा संसार का
कारोबार दिखाया
उसमें रमा कर रहकर भी
अछूता रखकर वैराग्य का पाठ
पक्का कराया
सत्य रूप बता दिया
महाभारत में तुमने अर्जुन चुना
यही पाठ पढ़ाने को
जैसी उसकी योग्यता क्षमता थी
वहीं तक उसे बताया समझाया
जानती हूँ तुम मुझसे
करते हो सबसे ज्यादा प्यार
तभी तो दम लिया अपने ही हिसाब से
मुझे करके तैयार
अब तो आ गये हो
तुम कभी भी न जाने को
बहुत चतुर हो तुम तो
अपना ही काम कराने में
उस्ताद हो ओ परम गुरु
कभी प्रकृति कभी माँ
कभी गुरु
कभी प्रकृति कभी माँ कभी गुरु
जब भी होती हूँ जरा-सी डाँवाडोल
सोचती हूँ क्यों संसार को छूती हूँ बारम्बार
बटोरने को दर्द
बटोरने को दर्द

जबकि तुम्हारे साथ तो सदा ही
परमानन्द में होती हूँ
जानती हूँ तुम्हारी सब चालाकियाँ
इस बार ठानी है तुमने
सबको अपने में ही मिलाने की
समाने की
मिल गया तुम्हें मीना नाम का जीव
बना कर उसे पुल तुम पहुँच रहे
अपने प्रिय जीवों तक
उनको अपना सत्य बताने को
जब थकता मेरा शरीर थोड़ा-सा भी
तुम करते तत्काल वर्षा ज्ञान की
औ’ भेज देते कोई न कोई जीव
परिधि में मेरी
दृढ़ करने को मेरा विश्वास मानवता में
अनु को अपनाया तुमने
रश्मि को रुलाया तुमने
अंजली को समझाया तुमने
विराट रूप दिखाया तुमने
विराट रूप दिखाया तुमने

अनीला को ठहराया तुमने
अश्विनी को बारम्बार भगाया और बुलाया तुमने
अजय को खेल दिखाया तुमने
निशी को बहलाया तुमने
नंदिता को शरमाया तुमने
इकबाल फ्रीडा मनीशा को सहलाया तुमने
सबको बालगोपाल बनाया तुमने
मुझे घेरकर कृष्ण बनाया तुमने
क्यों?
ताकि सदियों से प्यार प्यासी दुलार प्यासी
शृंगार प्यासी कर्म प्यासी
धर्म प्यासी सत्य प्यासी
तुम्हारी आत्मा को सही विधि से पा सकूँ
हर दर्द पर प्यार का लेप
लगा सकूँ
हर दर्द पर प्यार का लेप लगा सकूँ
यही चाहते थे न तुम कृष्ण
अब तो बोलो बोलो ना
बोलो तो
अब मुझे यह नहीं सुनना
नहीं जानना
नहीं समझना

कि तुम कौन हो
कहाँ हो
क्योंकि अब तुम यहीं हो
बिछुड़े सदियों के सभी साथी
जुटा दिये हैं तुमने
यही चाहते थे न तुम
तुम्हें मिल गयी मीना
जिसे खूब खेल दिखाया
खिला-खिला कर आँखमिचौनी भरमाया
इसी भरम में सकल जग भरमाया
कोई समझ न पाए इस लीला का विस्तार
यही तो है तेरी कृपा अपार
जो दिया खुल कर खेलने को संसार
होकर निडर निरहंकार निराकार
होकर निडर निरहंकार निराकार

संसार भरमाए देख-देख मेरा आकार
समझे इसमें भी कुछ व्यापार
कुछ चतुर व्यवहार
पर इस सोच से भी परे जाकर ही
तो होगा बेड़ा पार
जब होगा तेरा ही विस्तार
प्रणाम से प्रणाम से प्रणाम से
पूर्णता से तत्व ज्ञान से
यही सत्य है
यहीं सत्य है

  • प्रणाम मीना ऊँ

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