बड़ी तपस्या के बाद ही एक ऐसा भगवद्स्वरूप व्यक्तित्व उभरता है जिसके दर्शन में शीतलता प्रत्येक क्रिया में मधुरता वाणी में ओज और उपस्थिति में अद्भुत तेज होता है यही सत्य है यहीं सत्य है
बस हमें स्वयं का निरीक्षण करने की आवश्यकता है। हम खुद समझ सकते हैं
केवल अपने आप से। जो हो रहा है, उसके लिए दूसरों को दोष देना बंद करो
आप को। अपने अंदर समाधान के लिए देखो।
यही सच्चाई है।